Friday, March 5, 2010

जीवन का सच

सच क्या है
- एक संघर्ष है जीवन का
जिसके बिना जीना, जीना नहीं
झूठ तो पतझड़ के पत्तों की तरह बिखर जाता है।

जो इस पतझड़ के रोके न रुके,
हार के डर से न झुके ,
हालात जो भी हो, रास्ते में हो कांटे या फूल,
टूटे नहीं जो वही सच है।

अपने मन की आवाज़ हमे खुद ही है समझनी,
अंतर मन के सच से दूर कोई राह हमें नहीं पकडनी।
अपनी आँखों के आंसू खुद ही पोछ ले हम,
पर दुनिया के झूठे बाज़ार में क्यों खुद को बेच दे हम।

जब एक चींटी दाना लेकर चलती है,
बार बार गिरती पर फिर भी वो चढ़ती है।
महनत का फल मिलता जरुर है,
देर से ही सही पर एक गहरा असर छोड़ता जरुर है।

सच के रास्ते में असफलता एक चुनौती है
और इस चुनौती को जीतना ही सही जीवन है।
संघर्ष करके ही कुछ हासिल होगा,
इंसान तभी कुछ काबिल होगा।


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